* अयोध् याकाण् ड *
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रानीने बहु त प् रकारके दीन वचन कहे । उन् हे ं सु नकर कु बरीने त् रियाचरित् र फै लाया। [वह बोली--]
तु म मनमे ं ग् लानि मानकर ऐसा क् यों कह रही हो, तु म् हारा सु ख-सु हाग दिन-दिन दू ना होगा॥ २॥
जे हिं राउर अति अनभल ताका । सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका ॥।
कु बरीने कै के यीको [सब तरहसे ] कबू ल करवाकर (अर् थात् बलिपशु बनाकर) कपटरू प
छु रीको अपने [कठोर] हृ दयरू पी पत् थरपर टे या (उसकी धारको ते ज किया) | रानीं कै के यी अपने
निकटके (शीघ् र आने वाले ) दु :खको कै से नहीं दे खती, जै से बलिका पशु हरी-हरी घास चरता है
[पर यह नहीं जानता कि मौत सिरपर नाच रही है ] ॥ १॥
सु नत बात मृ दु अं त कठोरी । दे ति मनहु ँ मधु माहु र घोरी ॥
कह चे रि सु धि अहइद कि नाहीं । स् वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं ॥
मन् थराकी बाते ं सु नने मे ं तो कोमल है ं , पर परिणाममे ं कठोर (भयानक) है ं । मानो वह शहदमे ं
घोलकर जहर पिला रही हो। दासी कहती है --हे स् वामिनि! तु मने मु झको एक कथा कही थी,
उसकी याद है कि नहीं 2॥ २॥
गाम
जब ते ं कु मत सु ना मै ं स् वामिनि । भू ख न बासर नीद न जामिनि ।॥
जिसने तु म् हारी बु राई चाही है , वही परिणाममे ं यह (बु राईरू प) फल पाये गी। हे स् वामिनि!
मै ं ने जबसे यह कु मत सु ना है , तबसे मु झे न तो दिनमे ं कु छ भू ख लगती है और न रातमे ं नीं द
ही आती है ॥ ३॥
पू ँ छे उँ गु निन् ह रे ख तिन् ह खाँ ची । भरत भु आल होहिं यह साँ ची ॥
भामिनि करहु त कहाँ उपाऊ | है तु म् हरीं से वा बस राऊ ।॥
मै ं ने ज् योतिषियों से पू छा, तो उन् हों ने रे खा खीं चकर (गणित करके अथवा निश् चयपू र् वक) कहा
कि भरत राजा हों गे , यह सत् य बात है । हे भामिनि! तु म करो, तो उपाय मै ं बताऊँ । राजा तु म् हारी
से वाके वशमे ं है ं ही ॥ ४॥
दो०--परउँ कू प तु अ बचन पर सकउँ पू त पति त् यागि।
कहसि मोर दु खु दे खि बड कसनकरब हित लागि । २१ ॥
[कै के यीने कहा.. ] मै ं ते रे कहने से कु एँ मे ं गिर सकती हू ँ , पु त् र और पतिको भी छोडु सकती
हू ँ । जब तू मे रा बडा भारी दु :ख दे खकर कु छ कहती है , तो भला मै ं अपने हितके लिये उसे क् यों
न करू ँ गी ?2॥ २१ ॥
कु बरीं करि कबु ली कै के ई | कपट छु री उर पाहन टे ई।।
लखइद न रानि निकट दु खु कै से ं । चरद् द हरित तिन बलिपसु जै से ं ॥

Hindi Test - 1/4